नदी पद्मावती | |
सूखकर काँटा हुई है भील कन्या सी नदी पद्मावती ठूँठ से उतरी चिरैया चुग रही है रेत बुन रहा वन एक सन्नाटा तैरते वातावरण में संशयों के प्रेत उबलते जल में पड़ी है सोन मछली हाँफती जिंदगी है आदि कवि की आँख से हरती व्यथा भूमि से हैं आज निर्वासित जनक जननी आत्मजा फेंकता है काल अपने जाल काँपती असहाय सी बूढ़ी शती | |
Sunday, August 28, 2011
नदी पद्मावती
महका मन
महका मन | |
बहुत दिन के बाद महका मन सिलवटें कम की समय ने एक ठंडक पी लहलहाने लगा उर का विपिन दंडक भी मुदित चिड़ियों-सा प्रकृति के साथ चहका मन बहुत दिन के बाद महका मन मिल गई पर्यावरण को शुद्ध आक्सीजन इस तरह से कुछ हुआ ॠतु-चक्र परिवर्तन डूबकर स्वप्निल सुरा-सरि आज बहका मन बहुत दिन के बाद महका मन | |
बदरा बरस गए
बदरा बरस गए | |
| मीठी-मीठी मचा गुदगुदी मन में सरस गए बदरा बरस गए कजरारे बदरा बरस गए अभी-अभी तो नभ गलियों में इठलाते से आए थे कभी घूमते कभी झूमते भँवरे से मँडराए थे देख घटा की अलक श्यामली अधरों से यूँ परस गए बदरा बरस गए मतवारे बदरा बरस गए रीती नदिया झुलसी बगिया डाली-डाली प्यास जगी जल-जल सुलगी दूब हठीली नेह झड़ी की आस लगी भरी गगरिया लाए मेघा झर-झर मनवा सरस गए बदरा बरस गए कजरारे बदरा बरस गए सुन के तेरे ढोल-नगाड़े धरती द्वारे आन खड़ी रोली-चंदन मिश्री-आखत धूप औ' बाती थाल धरी रोम-रोम से रोए, साजन बिन तेरे हम तरस गए बदरा बरस गए लो कारे बदरा बरस गए शिल्पा सैनी | |
आदमी...बौना हुआ है
आदमी...बौना हुआ है
प्रगति की लंबी छलाँगें मारकर भी
आदमी क्यों इस क़दर बौना हुआ है?
बो रहा काँटे
भले चुभते रहें वे,
पीढ़ियों के
पाँव में गड़ते रहें वे,
रोशनी को छीनकर बाँटें अंधेरा,
राह में अंधा हर एक कोना हुआ है।
मेड़ ही
अब खेत को खाने लगी है
और बदली
आग बरसाने लगी है,
अब पहरुए ही खड़े हैं लूटने को,
मौसमों पर, हाँ, कोई टोना हुआ है।
क्षितिज के
उस पार जाने की ललक में,
नित
कुलाँचें ही भिड़ाता है फलक में,
एक बनने को चला था डेढ़, पर वह
हो गया सीमित कि अब पौना हुआ है।
२६ जनवरी २००९
शिल्पा सैनी
शिल्पा सैनी
प्रगति की लंबी छलाँगें मारकर भी
आदमी क्यों इस क़दर बौना हुआ है?
बो रहा काँटे
भले चुभते रहें वे,
पीढ़ियों के
पाँव में गड़ते रहें वे,
रोशनी को छीनकर बाँटें अंधेरा,
राह में अंधा हर एक कोना हुआ है।
मेड़ ही
अब खेत को खाने लगी है
और बदली
आग बरसाने लगी है,
अब पहरुए ही खड़े हैं लूटने को,
मौसमों पर, हाँ, कोई टोना हुआ है।
क्षितिज के
उस पार जाने की ललक में,
नित
कुलाँचें ही भिड़ाता है फलक में,
एक बनने को चला था डेढ़, पर वह
हो गया सीमित कि अब पौना हुआ है।
२६ जनवरी २००९
शिल्पा सैनी
कलफ लगे खादी के कुरते
सड़कों पर
फिर मचक रहे हैं
कलफ लगे खादी के कुरते।
मन कौए का बगुले सा तन
मगरमच्छ-आँसू ले डोलें,
लगें धूप में छाँव घनेरी
कोयल जैसी बोली बोलें,
रह-रह कर
बस कुहक रहे हैं
कलफ लगे खादी के कुरते।
कितने षिलान्यास-लोकार्पण
उद्घाटन की खबरें बनकर,
पटे पड़े हैं अखबारों में
छायाचित्रों में सज-सजकर,
सिक्कों से
अब खनक रहे हैं
कलफ लगे खादी के कुरते।
पहन-पहन गणवेष मौसमी
तन के उजले मन के कारे
प्रजातंत्र की शरद-जुन्हैया
चले ब्याहने ये अँधियारे,
दूल्हा बन
कर ठसक रहे हैं
कलफ लगे खादी के कुरते।
विनम्रता हो मूर्त, भाल नत
हाथ जोड़ सड़कों पर घूमें,
आम आदमी के चरणों को
खास आदमी झुक-झुक चूमे,
बोल मधुर
ले चहक रहेे हैं
कलफ लगे खादी के कुरते।
सड़कों पर
फिर मचक रहे हैं
कलफ लगे खादी के कुरते।
मन कौए का बगुले सा तन
मगरमच्छ-आँसू ले डोलें,
लगें धूप में छाँव घनेरी
कोयल जैसी बोली बोलें,
रह-रह कर
बस कुहक रहे हैं
कलफ लगे खादी के कुरते।
कितने षिलान्यास-लोकार्पण
उद्घाटन की खबरें बनकर,
पटे पड़े हैं अखबारों में
छायाचित्रों में सज-सजकर,
सिक्कों से
अब खनक रहे हैं
कलफ लगे खादी के कुरते।
पहन-पहन गणवेष मौसमी
तन के उजले मन के कारे
प्रजातंत्र की शरद-जुन्हैया
चले ब्याहने ये अँधियारे,
दूल्हा बन
कर ठसक रहे हैं
कलफ लगे खादी के कुरते।
विनम्रता हो मूर्त, भाल नत
हाथ जोड़ सड़कों पर घूमें,
आम आदमी के चरणों को
खास आदमी झुक-झुक चूमे,
बोल मधुर
ले चहक रहेे हैं
कलफ लगे खादी के कुरते।
२२ अगस्त २०११
दिन
दिन | |
सीढ़ियों पर धूप से चढ़ते-उतरते दिन। नहीं हारे हर घड़ी हर पल चले, तार पर ज्यों चल रहे हों सिलसिले, और नट की झूम से गिरते-संभलते दिन। दिन चढ़ा ऐसे कि हो हल्दी चढ़ी, शाम शरमीली रचा मेहंदी खड़ी, रूपसी के रूप से सजते-संवरते दिन। अभी क्षिति पर थे अभी आकाष में, साँप-सीढ़ी से समय के पाष में, आदमी के भाग्य से बनते-बिगड़ते दिन। शिल्पा सैनी | |
दोस्त तुम हो
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