स्वार्थ की दोपहरी में | |
दुपहरी में क्यों रहा टहल तन-मन झुलसा देगा अपनों का छल काँटों से भरी हुयी छूना मत शाख आग लगा सकती है बुझी हुयी राख तेज़ बहुत आँधी है बस, ज़रा संभल फँसना मत कलियों के रूप में कभी धोखे ही खाकर मैं आया अभी आग सी हवायें हैं मोम से महल रोओ मत भीगेंगे आँख के सपन मुड़ कर जो देखोगे आयेगी थकन औरों को देखो पर जाओ न मचल जिसको तू सौंपेगा तन मन की गंध जिस पर लुटायेगा अपना मकरन्द वही तुझे कह देंगे चमन से निकल शिल्पा सैनी | |
Sunday, August 28, 2011
स्वार्थ की दोपहरी में
चल चलें इक राह नूतन
चल चलें इक राह नूतन | |
भय न किंचित हो जहाँ पर पल्लवित सुख हो निरंतर अब लगाएँ हम वहीं पर बन्धु - निज आसन द्वेष - ईर्ष्या को न प्रश्रय दुर्गुणों की हो पराजय हो जहाँ बस प्रेम की जय खिल उठे तन मन शिल्पा सैनी | |
फिर क्यों मन में संशय तेरे
फिर क्यों मन में संशय तेरे | |
जब-जब दीप जलाये तूने दूर हुये हैं घने अंधेरे फिर क्यों मन में संशय तेरे स्वयं शीघ्र धीरज खोता है क्रोध कि ऐसा क्यों होता है नियति नवाती शीश उसी को जो सनिष्ठ इक टेक चले रे फिर क्यों मन में संशय तेरे वीर पराजित हो सकते हैं जय की आस नहीं तजते हैं निष्प्रभ होकर डूबा सूरज तेजवन्त हो उगा सवेरे फिर क्यों मन में संशय तेरे जग में ऐसा कौन भला है जिस पर समय न वक्र चला है धवल-वर्ण हिमकर को भी तो ग्रस लेते हैं तम के घेरे फिर क्यों मन मे संशय तेरे मान झूठ अपमान झूठ है जीवन का अभिमान झूठ है जग-असत्य की प्रत्यंचा पर सायक हैं माया के प्रेरे फिर क्यों मन में संशय तेरे शिल्पा सैनी | |
दिन की चिड़िया
दिन की चिड़िया | |
दिन की चिड़िया कतरव्यौंत में अपने ही पर कुतर रही है डैने खोले, काली छाया धीरे-धीरे उतर रही है एक-एक कर झरते जाते हैं सुर्खाबी पंख नदियों से घोंघे गुहराते हैं मंदिर से शंख आँखों के जंगल से कोई शोभा यात्रा गुजर रही है बीच-बीच में दरकी-दरकी सभी उड़ाने हैं चिड़िया की आँखों मै चावल के दो दाने हैं इन दानों पर जाने कब से दुनिया भर की नजर रही है बैठी है बिजली के तारों पर झूले मन में हम झूलें तो जाने क्या हो जाये पल-छिन में इसीलिए यह चिड़िया है जो बिजली से बेखबर रही है | |
जय जन भारत
जय जन भारत | |
जय जन भारत जन- मन अभिमत जन गणतंत्र विधाता, जय गणतंत्र विधाता गौरव भाल हिमालय उज्जवल हृदय हार गंगा जल कटि विंध्याचल सिंधु चरण तल महिमा शाश्वत गाता जय जन भारत... हरे खेत लहरें नद-निर्झर जीवन शोभा उर्वर विश्व कर्मरत कोटि बाहुकर अगणित-पद-ध्रुव पथ पर जय जन भारत... प्रथम सभ्यता ज्ञाता साम ध्वनित गुण गाता जय नव मानवता निर्माता सत्य अहिंसा दाता जय हे- जय हे- जय हे शांति अधिष्ठाता जय-जन भारत... | |
दीप धरो
दीप धरो | |
| सखि ! दीप धरो ! काली-काली अब रात न हो, घनघोर तिमिर बरसात न हो, बुझते दीपों में --------------------हौले-हौले, सखि ! स्नेह भरो ! सखि ! दीप धरो ! दमके प्रिय-आनन हास लिए, आगत नवयुग की आस लिए, अरुणिम अधरों से --------------------हौले-हौले, सखि ! बात करो ! सखि ! दीप धरो ! बीते बिरहा के सजल बरस गूँजे मंगल नव गीत सरस घर आये प्रियतम, --------------------हौले-हौले सखि ! हीय हरो ! सखि ! दीप धरो ! | |
तितली
तितली | |
| दूर देश से आई तितली चंचल पंख हिलाती। फूल-फूल पर कली-कली पर इतराती इठलाती। यह सुन्दर फूलों की रानी धुन की मस्त दिवानी, हरे भरे उपवन में आई करने को मनमानी। कितने सुन्दर पर है इसके जग मग रंग रंगीले, लाल हरे बैजनी वसन्ती काले नीले पीले। कहाँ - कहाँ से फूलों के रंग चुरा चुरा कर लाई आते ही इसने उपवन में कैसी धूम मचाई। डाल-डाल पर पात-पात पर यह उड़ती फिरती है, कभी खूब ऊँची चढ़ जाती फिर नीचे गिरती है। कभी फूल के रस पराग पर रूक कर जी बहलाती, कभी कली पर बैठ, न जाने गुप चुप क्या कह जाती। | |
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