आजकल | |
| हवा में फिर से घुटन है आजकल रोज सीने में जलन है आजकल1घुल रही नफरत नदी के नीर में नफरतों का आचमन है आजकल1कौन-सी अब छत भरोसे मन्द है फर्श भी नंगे बदन है आजकल1गले मिलते वक्त खंजर हाथ में हो रहा ऐसे मिलन है आजकल1फूल चुप खामोश बुलबुल क्या करें लहू में डूबा चमन है आजकल1गोलियाँ छपने लगी अखबार में वक्त कितना बदचलन है आजकल1जा नहीं सकते कहीं बचकर कदम बाट से लिपटा कफन है आजकल शिल्पा सैनी | |
Sunday, August 28, 2011
आजकल
सिंहासन
सिंहासन | |
| राजा के घर बेटा जन्मा राजा हुए मगन राज-पाट घर में ही रह जाने के हुए जतनराजा ने राजा बनने के गुर को खूब सहेजा इसीलिए अपने बेटे को जंगल पढ़ने भेजा राजनीति लोमड़ी पढ़ाती बीता अनुशासन मकड़ी से सीखा, शिकार करने का जाला बुनना बंदर ने बतलाया, फल वाली डाली को चुनना भालू ने दीक्षा दी- कैसे मरते हैं दुश्मन निरपराध लोगों को जब धारा में गया लपेटा परजा समझ गई, पढ़कर आया राजा का बेटा भूखे बाघों के कब्ज़े में, रहना, 'सिंहासन' शिल्पा सैनी | |
सुबह
सुबह | |
| रोशनी के नए झरने लगे धरती पर उतरने क्षितिज के तट पर धरा है ज्योति का जीवित घड़ा है लगा घर-घर में नए उल्लास का सागर उमड़ने घना कोहरा दूर भागे गाँव जागे, खेत जागे पक्षियों का यूथ निकला ज़िंदगी की खोज करने धूप निकली, कली चटकी चल पड़ी हर साँस अटकी लगीं घर-दीवार पर फिर चाह की छवियाँ उभरने चलो, हम भी गुनगुनाएँ हाथ की ताकत जगाएँ खिले फूलों की किलक से चलो, माँ की गोद भरने शिल्पा सैनी | |
मैं शिखर पर हूँ
मैं शिखर पर हूँ | |
| घाटियों में खोजिए मत मैं शिखर पर हूँधुएँ की पगडंडियों को बहुत पीछे छोड़ आया हूँ रोशनी के राजपथ पर गीत का रथ मोड़ आया हूँ मैं नहीं भटका रहा चलता निरंतर हूँ। लाल- पीली उठीं लपटें लग रही है आग जंगल में आरियाँ उगने लगी हैं आम, बरगद, और पीपल में मैं झुलसती रेत पर रसवंत निर्झर हूँ साँझ ढलते पश्चिमी नभ के जलधि में डूब जाऊँगा सूर्य हूँ मैं जुगनुओं की चित्र----लिपि----में जगमगाऊँगा अनकही अभिव्यक्ति का मैं स्वर अनश्वर हूँ शिल्पा सैनी | |
गंध के हस्ताक्षर
गंध के हस्ताक्षर | |
| भेजता ऋतुराज किसलय-पत्र पर इंद्रधनुषी रंग वाले गंध के हस्ताक्षर!झूमते हैं खेत वन-उपवन हवा की ताल पर थिरकते बंसवारियों के अधर पर फिर वेणु के स्वर विवश होकर पंचशर की छुअन से लग रहे उन्मत्त सारी सृष्टि के ही चराचर! आज नख-शिख फिर प्रकृति के अंग मदिराने लगे, और निष्ठुर पत्थरों तक सुमन मुस्काने लगे पिघलता है पुनः कण-कण का ह्रदय हर कहीं पर अब चतुर्दिक फागुनी मनुहार पर! शिल्पा सैनी | |
धूप के नखरे बढ़े
धूप के नखरे बढ़े | |
शीत की अँगनाइयों में धूप के नखरे बढ़े बीच घुटनों के धरे सिर पत्तियों के ओढ़ सपने नीम की छाया छितरकर कटकटाती दाँत अपने गोल कंदुक के हरे फल छपरियों पर जा चढ़े फूल पीले कनेरों के पेड़ के नीचे झरे तो तालियों में बज रहें हैं बेल के पत्ते हरे जो एक मंदिर गर्भ गृह में मूर्तियाँ मन की गढ़े बहुत छोटे दिन लिहाफों में बड़ी रातें छिपाकर भागते हैं क्षिप्र गति में अँधेरों में कहीं जाकर शाम के दो जाम ओठों पर चढ़े शीशे मढ़े शिल्पा सैनी | |
हँसिकाएँ
हँसिकाएँ
श्रीमती जी ने इन दिनों
स्वच्छता सप्ताह मनाया है
शुभारंभ के तौ र पर
पति की जेब को अपनाया है।
नारी स्वतंत्रता को
पुरुष ने खूब भुनाया।
अपनी नौकरी उन्हें दी
उनकी पगार को अपनाया।
जैसे ही पतिदेव ने
ओवर टाइम का मन बनाया।
पत्नी ने की घर की सफाई और
बर्तनों का ढेर उन्हें थमाया।
आजकल की आधुनिकता का
क्या गजब अंदाज है
मरती जा रही है सभ्यता
बेहूदगी का राज है।
शिल्पा सैनी
20 जुलाई २०११
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